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वो बचपन फिर लौट आता

वो बचपन फिर लौट आता poem by atul kumar
ना फ़िक्र थी पैसे कमाने की ना ज़िद थी आसमां पाने की
भागती दौड़ती जिंदगी में न ख़्वाहिश थी आगे निकल जाने की,
न डर था कुछ खोने का, न वजह थी कोई रोने की
न बड़े बड़े ख़्वाब थें न कोई शिकायतें
न शिकन थी किसी बात की, न चेहरे पर बनावटी मुस्कुराहटें
काश वो बेपरवाह, मदमस्त, छोटी छोटी ख्वाहिशों से भरा
वो बचपन फिर लौट आता।

न देर से उठने का डर था न रात में सोने की जल्दी
छत पर बैठ चाँद को देख रात गुजरती थी
जब जज़्बातों के खेल न हम समझते थे,
बस अपने धुन में खोये रहते थे
दोस्तों को ही दौलत समझते थे, खिलौनों का हिसाब जब रखते  थे,
रूठने मनाने का न कोई दौर था, बस खुद को ही बादशाह समझते थे
वो बेफिक्री, नासमझी, वो रईसी से भरा,
वो बचपन लौट आता।

मसरूफियत का वो दौर था, न कुछ पाने की जद्दोजहद थी
ना भीड़ में खोने का डर था, न कोई पहचान बनानी थी,
कागज के नोट से अच्छा वो कागज की कश्ती अच्छी लगती थी
जिम्मेदारियों से अच्छा बस्ते का बोझ कंधो पर अच्छा लगता था,
मासूमियत से भरा दोस्त का वो चेहरा सच्चा लगता था,
बेवजह, बेहिसाब, बेसबब वो जीने का अंदाज़ काश फिर लौट आता,
लड़कपन से भरा वो ठौर , दोस्तों का कारवां
वो बचपन फिर लौट आता

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