मेरी प्रेरणा हो तुम... poem by atul kumar
मेरी प्रेरणा हो तुम…
December 15, 2020
बस यूँ ही चलते चलते by atul kumar
बस यूँ ही चलते चलते
December 15, 2020
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वो चार दिन

वो चार दिन by author atul kumar
वो चार दिन और सर्द में डूबी वो सुबह और शाम,
बेफ़िक्री और मसरूफियत से भरी मुलाकातें
जज्बातों का वो मखमली एहसास और तेरा साथ।
घने कोहरे के चादर में लिपटी वो राते,
और उस हर पल में जादू भरती तेरी वो तिलस्मी बातें,
मेरी यादों में खुशबू की तरह महकते रहेगें।

वो छोटी छोटी मुलाक़ातें और एहसासों का वो लम्बा सफ़र,
मुट्ठी से फिसलता वक़्त और वो लंबी बोझिल से तेरी सांसे,
धड़कनों ने जैसे मीलों का सफर तय किया था
नैनों के दरख़तों पर जैसे कोई ख्वाब ठहरा था
वो शोर तुम्हारी सांसों का, नूर तेरी उन आँखों का।
मुद्दतों के बाद मिली थी तू मुझे ऐ जिंदगी,
अब तेरे ख्यालों के साये में हम सँभालते रहेंगे।

सुर्ख से होठों पर जैसे कोई लफ्ज़ ठहरा था,
रातों पर घने कोहरे का जैसे एक पहरा था,
तुम्हारे पास होने का वो एहसास कितना गहरा था,
तेरे तसव्वुर के दायरे में हम यूँ ही अब संवरते रहेंगे।
वो चार दिन एक तस्वीर बनकर अब मेरे आँखों में रहेंगे।

ऐ जिंदगी दे दी है मोहलत तुझे कुछ और वक़्त तन्हा गुजार ले,
जो ख़्वाब देखे हैं साथ, अब अपने आँखों में उन्हें संवार ले,
जो तू साथ नहीं तो आधा हु मैं, पर कभी अधूरा नहीं,
आएंगे ऐसे भी दिन की तुम बिन मेरी कोई सुबह और रात नहीं,
वो चार दिन और वो मुलाक़ातें हमारी तब बहुत याद आयेंगे,
विरह के उस मौसम की मीठी यादें हमे हर पल गुदगुदाएंगे।

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