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नोट का दंश by atul kumar
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ये एहसास हुआ

ये एहसास हुआ by atul kumar
माँ के आँचल में बंधे रहते थे जो कागज के चंद टुकड़े
आज घर का चूल्हा जला तो कागज की तपिश का एहसास हुआ

एक अरसे से जमा किया था जो पाई पाई उसकी क्या कीमत थी
बाउजी के बेबस आँखों को जब चमकते देखा तो एहसास हुआ।

जीवन पर्यंत अपने मन को मार, हर चीज़ को हार, आज हर जंग जीत गयी हो जैसे
गर्व से चौड़े बाउजी के सिने को देखा तो एहसास हुआ।

वो कागज के टुकड़े किसी वीर सिपाही के मैडल की तरह दिख रहे थे
वर्षो से जीवन भर माँ ने कोई युद्ध लड़ा है ऐसा एहसास हुआ।

बेहाल है जाने कितने कुटुंब और जाने कितने घर इस कालेधन के खेल में
ऐसे ही हर आंगन में एक सिपाही खड़ा होगा
ऐसे ही हर आँचल से कागज को टुकड़ा निकला होगा

फिर कहीं जाकर उस घर का चूल्हा जला होगा
एक सुकून हर माँ को मिला होगा
देखा मैंने अपनी माँ को तो ये एहसास हुआ।

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