नोट का दंश by atul kumar
नोट का दंश
December 15, 2020
वो बचपन फिर लौट आता poem by atul kumar
वो बचपन फिर लौट आता
December 15, 2020
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मुकम्मल हो जाता हूँ।

मुकम्मल हो जाता हूँ। by atul kumar
मिलकर तुमसे पूरा हो जाता हूँ
हर वक़्त वरना अधूरा ही रहता हूं

सांसे चलती तो हैं पर थम कर जरा
टुकड़ों में जैसे जिन्दा रहता हूँ

बातें तुम्हारी बहला देती हैं दिल को
तो कुछ वक़्त और संभल जाता हूँ

खामोश लबों पर जब नाम आता है तेरा
तो हौले से मुस्कुरा लेता हूं

खुद से मिला नहीं जाने कबसे
मिलकर तुमसे खुद से मिल लेता हूं

किस भीड़ में जाने खड़ा हूँ तन्हा मै
तुमसे मिलता हु जब भी खुद को पा लेता हूं

तू मझमें है या मैं तुझमें ये मालूम नहीं
तुमसे मिलकर ही मैं मुकम्मल हो जाता हूं

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