वो चार दिन by author atul kumar
वो चार दिन
December 15, 2020
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बस यूँ ही चलते चलते

बस यूँ ही चलते चलते by atul kumar
तेरी सादगी किसी ताबीज़ की तरह है 
दिखती है तेरे अक्स पर और असर हर किसी के रूह पर कर जाती है 

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रास्ते भी तूने तय किये...मंजिले भी तुमने तय की
वफ़ा भी तूने तय किया ...बेवफाई भी तूने तय की 
नजदीकियां भी बनाई तूने...दूरियाँ भी तूने तय की

कुछ तो मेरे हिस्से में रखा होता तूने
जिंदगी का जश्न भी तय तूने किया और.... वीरानियाँ भी तूने तय की 

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मोहब्बत तेरे जिस्म से होती तो भुलाना इतना मुश्किल न था 
रूह में जो कैद है ....
यादों के इस पींजरे में ये नादान परिंदा उस दिल का क्या करें

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मुखातिब हुए जो हम कल उनसे तो खुद से मुलाकात हुई...
लबों ने कुछ न कहा बस नज़रों से बात हुई
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रात का पहर दरवाजे पे खड़ा है...
खिड़कियों से इस शाम को गुजर जाने दो 

एक अरसे बाद हो रही है वही रूहानी बारीश....
इस बंजर दिल को आज फिर भींग जाने दो

चलो आज खड़े हो जाते है शहर के किसी मोड़ पर ...
जो रास्ते कभी मिल न सके आज उन्हें उस चौराहे पर मिल जाने दो 
ठहर जाओ तुम यहाँ ....और वक़्त को जाने दो

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वही शहर है, वही रास्ते हैं....वैसा ही बारिश का मौसम
बूंदों की वैसी ही साजिश ...मैं हूं और वही मंजिल है
अगर कुछ नहीं है तो वो तू है ....मेरे हाथों में तेरा हाथ
और मेरे अंगुलियों में उलझी हुई तेरी अंगुलियाँ

और तेरे गरम सांसों से पसीजता हर अहसास....वो सब कुछ भी नहीं है

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फिर से कुछ सपने बुन जाना वक़्त को कात कात के
कहीं सर्दियों में उन ख्वाबों पर बर्फ की चादर न पड़ जाए....
और ठिठुरते रह न जाये ये नींद और ख्वाबों में कोई खलल न पड़ जाए

ओढ़ लेंगे बुने हुए वक़्त को.....
की उन ख्वाबों को थोड़ी तपिश मिल जाये

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अमावस की रात में जुगनू की ही बात होती है...
उस दिन तो चांद की भी क्या औकात होती है
कर देते हैं रोशन जिंदगी को बन कर जुगनू कुछ लोग इस दुनिया मे ..
जला कर खुद को इस दुनिया मे उजियारा भर देते हैं
हर मंजिल हर सफर को रोशन कर देते हैं

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आवारा चाँद कल बेताब होकर आसमान में घूमता रहा
तेरे दीदार की आरजू में खिड़कियों से बार बार तकता रहा..
घने बादलों की साजिश कुछ ऐसी थी उस रात
कायनात के इस चिलमन में वो रात भर तन्हा तरसता रहा।
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ऐ दिले-नादान तू क्यों बेसबर है,
है दरिया इन पलकों में तुझे क्या खबर है,
इस सफ़र में वक़्त लग जाता है अक्सर
ये रूह से रूह तलक का सफर है
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वो पुरानी डायरी....हर तारीख पर लिखी ...
साल दर साल दिन ब दिन और हर पल की कहानी ...
यादों के स्याही में डूबी...एहसासों वाले कागज के टुकड़ों पर लिखी
एक कहानी ...पन्नों के बिच में रखे
उस गुलाब के खुशबू से लबरेज़ ...तेरी मेरी कहानी
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बैठे रहे जो तेरे आगोश में हम...आसमां मचलता रहा...
जलता रहा चाँद ...और रात का हर पहर पिघलता रहा
टप.. टप ..करके गिरे थे तारे मोम की तरह जमीन पे...
सुना है कि सारी रात शहर का मिजाज बदलता रहा
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