ये एहसास हुआ by atul kumar
ये एहसास हुआ
December 15, 2020
मुकम्मल हो जाता हूँ। by atul kumar
मुकम्मल हो जाता हूँ।
December 15, 2020
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नोट का दंश

नोट का दंश by atul kumar
बैंक और एटीएम के बाहर लगी है लंबी कतार
हॉस्पिटल के बाहर सड़कों पर पड़े है हज़ारो बीमार
ठेलमठेल भीड़ भरी है राशन की दुकानों में
लगन की बेला में बैठा है एक बाप लाचार।

श्मशान के बाहर पड़ा एक शव इंतेज़ार कर रहा है जलने का
खाट पर पड़ी बीमार माँ इंतेज़ार कर रही है दवा के मिलने का
रिक्शा खिंच कर भरता था पेट जिस गरीब का
चौक पर खड़ा इंतेज़ार कर रहा सवारी मिलने का।

गयी है माँ डाकखाने, पांच बरस के बच्चे को घर पे छोड़
भूख से व्याकुल पेट उसका सांसे रहा है छोड़
भटक रहा है लाठी लेकर साठ साल का बेबस बूढा
भरी दुपहरी में सड़क पर ही रहा है दम तोड़।

चीत्कारों को सुन नहीं सकते, रोते बिलखते लोगों को तो देखो
कालेधन के इस मायाजाल में फसते आम आदमी को देखो
काल का ग्रास न बन जाये सुख चैन अब तो उनको देखो
सही है अर्थव्यवस्था की दुहाई, देश का उत्थान भी सही है
पर किस कीमत पर जरा उसको भी तो देखो
बनता है देश जिनसे, चलता है देश जिनसे, उनके इस हाल को देखो।

है देश खड़ा इस बदलते परिवेश में,सबने इसे स्वीकारा है
पर बदले नोट के दंश ने आज सबको मारा है
जान से ही जहान है लोगों से ही देश महान है
हर नीति,अर्थव्यवस्था से परे इस बात को पहचानो।

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