पर आप न आये पापा by atul kumar
पर आप न आये पापा
December 15, 2020
रस्म होली की, प्यार रंग का by atul kumar
रस्म होली की, प्यार रंग का
December 15, 2020
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कितने जिद्दी थे न पापा

कितने जिद्दी थे न पापा by atul kumar
कितने जिद्दी थे न पापा, चले गये और लौट के भी न आये
उस दिन शाम को आंगन में जाने क्यों इतनी भीड़ उमड़ी थी,
फिर भी बेसुध,बेफिक्र आंखों को मूंद भैया के गोद में सर रख लेटे रहे।
कैसी थकान, कैसी ये बेपरवाही, कैसी मसरूफियत थी,
हर रोज़ तो चाय पीकर शाम की सैर पर निकल जाते थे पापा,
फिर क्यों, हर आहट से अनजान आंगन में लेटे हुए घर के छत को तकते रहे।


माथे को चूमा, नर्म हाथों को सहलाया, अंगुलियों से पैरों को गुदगुदाया,
सीने पर कानों को रख डॉक्टर वाले खेल से धड़कनों का हिसाब लगाया
बहुत कोशिशें की पर बचपन का कोई खेल तमाशा भी काम न आया,
बड़ी मिन्नते की, बहुत मनाया, पापा को मैंने बहुत जगाया,
अब न सताओ, उठ भी जाओ, डॉक्टर वाला खेल खत्म हुआ
न सुना मेरी चीखों को, न आंसुओं को पोंछ गले लगाया,
कितने जिद्दी थे न पापा, चले गए और लौट कर भी न आये।



इतरा रहे थे, अविरल मुस्कान के साथ मौन लेटे हुए उनके कांधे पर,
जिनको अपने कंधों पे बिठा पापा ने दुनिया का ये मेला दिखलाया था,
शोर बढ़ती जा रही थी, सब चीख रहे थे, बिलख रहे थे,
हाथ उनका पकड़ उनको रोक रहे थे,
टूटी चूड़ियां, बिखरे सिंदूर, आंसुओं में डूबा वो आँगन,
चीत्कारों से फटे कलेजे, घर के दहलीज़ का वो सूनापन,
बेबस आंखें, बिलखती सांसे कुछ भी उनको न रोक सका,
जाने कैसी जिद थी, पापा उठे भी नहीं, रुके भी नहीं, बस चले गये
कितने जिद्दी थे न पापा, चले गये और लौट कर भी न आये।

आधी रात को लगा जैसे श्वेत कपड़ों में सिराहने बैठ
पापा बचपन की वो परियों वाली कहानी सुना रहे थे,
अपने गोद में मेरा सर रख बालों पर हाथ फिरा रहे थे,
आंखों को मींचकर देखा तो धुंधले रोशनी से छनकर
आँगन में रखी, फूलों से सजी, पापा की तस्वीर नज़र आयी,
वो मुस्कुरा रहे थे, बाहों को फैला मुझे बुला रहे थे,
बेतहाशा आधी नींद में मैं दौड़ा, तभी भैया ने हाथो को थामकर कहा,

" बहुत जिद्दी थे पापा, नहीं माने, बहुत मनाया, चले गये,
वो तारा जिसको छू कर हर तम्मना पूरी हो जाती थी
  जिस तारे को देख जिंदगी की हर सांझ होती थी
  वो आसमान का सबसे चमकता सितारा बन गये"

कितने जिद्दी थे न पापा, चले गये और लौट के भी न आये

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