मेरा जीवन आधार- " भाभी माँ " poem by atul kumar
मेरा जीवन आधार- ” भाभी माँ “
December 15, 2020
सिसकियाँ....एक एहसास by atul kumar
सिसकियाँ….एक एहसास
December 15, 2020
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काश ………..आप लौट आते पापा !!!

काश ...........आप लौट आते पापा !!! by atul kumar
बदला बदला सा लगता है ये घर
कुछ भी अपना सा नहीं लगता अब
है सब कुछ यहाँ पर पापा, पर आप जैसा कुछ भी नहीं।

जब आया घर पर इस बार , तब दरवाजा भी बेफिक्र ही खुला हुआ था,
घंटी न बजायी हमनें ,छुपकर दबे क़दमों से घर में घुसा था।
थका हुआ था बहुत मैं पापा,चुपचाप बैठके में चला गया
हमेशा की तरह गले लगाओगे पीठ सहलाओगे,
ऐसा सोच कर आपके दरवाजे के बाहर खड़ा हुआ
वो एहसाह नहीं था पापा कोई पास नहीं था,
मैं तो बस कमरे के बाहर बेचैन खड़ा था

भूख लगी थी बहुत हमे, समोसे लेने भी कोई बाजार गया नहीं
आप तो घर पर ही होंगे,तो दुकान में फ़ोन किया नहीं
माँ भी जाने कहाँ थी,  बेफिक्र छत पर कपडे सुखाने में लगी थी।
काफी देर हो गयी पापा आप आये नहीं,
परेशान था, हैरान था मैं,अब भी आपके कमरे में खड़ा था।
फैला हुआ था हर चीज़ आपके कमरे में, दराज़ का सामान बिखरा हुआ था,
नाराज़ होते थे जिस चादर की सिलवटों से आप,
वो भी बस ऐसे ही पड़ा था

कहाँ गए होंगे आप ? बूत था, खड़ा होकर मै सोच में पड़ा था।
तभी किसी ने हाथ थामा और फिर संभाला हमें
और कहा " पापा अंदर हैं चलो ले चले तुम्हे"
जिस आँगन में सर्दियों की धुप सेका करते थे आप
आँखे मूंदे हुए और मुठ्ठी बंद करके लेटे हुए थे आप

अब उठ जाओ पापा मैं फिर आ गया,
अब तो गले लगा लो पापा , अपने पास फिर बिठा लो पापा
फ़ोन करके खाने का सामान बाजार से मंगा लो
आँगन में फिर से कुर्सिया लगा लो,
बहुत से ठिठोले बचे हैं, बहुत सी बातें हैं बाकि
एक बार फिर से उठ जाओ न पापा।

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